सितारा भी कभी इतनी गर्दिश में पड़ गया
1972 में बनी फिल्म मोम की गुड़िया में बतौर हीरो,रतन चोपड़ा उर्फ़ अब्दुल जब्बार खान
हीरोइन तनूजा थी
हिन्दू बच्ची को गोद लिया था,ताउम्र शादी नहीं की
कैंसर से पीड़ित कलाकार को मदद की सख्त जरूरत
वाईपीएस चौहान
बॉलीवुड की दुनिया बाहर से जितनी शानदार दिखती है, अंदर से उतनी ही खौफनाक है। इस इंडस्ट्री में हर रोज कोई न कोई कलाकार शोहरत की बलुंदियों पर होता है या कोई दानों तक का मोहताज हो जाता है। वैसे तो बॉलीवुड में कई सुपरस्टार मौजूद हैं लेकिन कुछ एक्टर ऐसे हैं जो गिनी-चुनी फिल्मों में नजर आने के बाद बॉलीवुड से दूर हो गए। वक्त की मार ने उन्हें पाई -पाई का मोहताज कर दिया। अब वह अपनी जिंदगी के सबसे बुरे दौर से गुजर रहा है। रतन चोपड़ा यह उनका फ़िल्मी नाम है असली नाम है अब्दुल जब्बार खान है। 1972 में हिंदी फिल्म आई थी `मोम की गुड़िया' इस फिल्म के यह हीरो थे। साथ में तनूजा थी। आस का पंछी,अनपढ़,आई मिलन की बेला,आप की परछाइयां,अनजाना ,आप आये बहार आई और अवतार जैसी सुपर हिट फिल्मों के निर्माता,निर्देशक मोहन कुमार ने यह फिल्म बनाई थी।फिल्म में प्रेम नाथ,जीवन,ओम प्रकाश,टुनटुन जैसे मशहूर कलाकार थे। फिल्म के गीत भी काफी हिट हुए थे। तो ऐसा काया हुआ की यह कलाकार एक फिल्म के बाद गायब हो गया.जब की मोम की गुड़िया को अच्छी सफलता मिली थी।
अब्दुल जब्बार खान पिछले 26 वर्षों से पंचकूला में रह रहे है। आज कल वह मकान नंबर 137,सैक्टर 26 में रह रहे है। इनके जीवन की कहानी बॉलिवुड की फिल्मों जैसी ही है।ऊंचा समाना ,जिला करनाल के रहने वाले है। पंजाब पुलिस में नौकरी करते थे। कैंसर से पीड़ित है। डॉक्टर्स का कहना है की पिछले कई वर्षों से कैंसर है। लेकिन इन को जनवरी में ही इस का पता चला है। माली हालत इतनी ख़राब है की दवाई के भी कई बार पैसे नहीं होते। कभी कोई मदद कर देता है। करोना महामारी में तो और भी बुरा हाल हो गया है।
वह बताते है कि गांव में ही उनके पड़ोस में रहने वाला एक राजपूत परिवार माता वैष्णो देवी माता के दर्शन करने के लिए गाया हुआ था। वापसी में रास्ते में ही उनका एक्सीडेंट हो जाता है जिसमें पत्नी मौके पर ही दम तोड़ जाती है पति गंभीर रूप से घायल पठानकोट वहां स्थानीय अस्पताल में भर्ती करवा दिया जाता है। साथ में डेढ़ वर्ष की बच्ची भी उनके साथ थी जो बाल-बाल बच गई। उसको एक खरोच तक नहीं आई। अचानक घर पर टेलीफोन की घंटी बजती है फोन पठानकोट पुलिस डिपार्टमेंट से आता है। उन्होंने ही यह सब बताया कि आप तुरंत पठानकोट पहुंच जाइए। आपके पड़ोसी राणा जी का एक्सीडेंट हो गया है और आपको सूचना देने के लिए ही उन्होंने आपका नंबर दिया है। तो मैं तुरंत गाड़ी उठाई पठानकोट अस्पताल पहुंच गया। जहां पर उन्होंने पुलिस को यह बताया कि मेरी बेटी इन को सौंप दी जाए और यही इसकी देखभाल करेंगे। अस्पताल से वह अपने साथ इनको घर ले आए। अंतिम सांस लेने से पहले उन्होंने अपने सभी रिश्तेदारों को बुलाकर कहा कि खान साहब मेरी बेटी की देखभाल करेंगे और हिंदू रीति-रिवाजों के साथ ही इसकी शादी करेंगे। तो खान साहब ने तुरंत हां कर दी और बेटी को गोद ले लिया। अपनी शादी नहीं की। बेटी को पाला पोसा भी। उसकी शादी भी हिंदू रीति-रिवाजों के साथ की। खान साहब बताते है की बच्ची का पालनपोषण उन्होंने और उन की माता ने किया,बच्ची थोड़ी बड़ी हुई तो उसे सभी हिन्दू रीती रिवाजो के बारे बताया गया.हिंदू पूजा पद्धिति के बारे ज्ञान के लिए खास तोर पर टीचर राखी गई। घर में मंदिर बनाया गया,घंटियों की आवाजे गूंजती थी। भाई चारे के लोग विरोध करते थे की मुस्लिम के घर मंदिर की घंटियां क्यों बजती है। किसी की भी परवाह नहीं की। बेटी बड़ी हुई तो बेटी के लिए रिश्ते की बात चलाने में भी समाज के लोग अड़चन डालते रहे। वह बताते है लेकिन में मजबूत रहा किसी की भी परवाह नहीं की। मन में कभी भी यह नहीं आया की यह हिन्दू की बेटी है। घर में छोटा सा मंदिर भी है। बेटी नमाज भी पड़ती है।
खान साहब बताते है की मुझे नाटक और भाषण प्रतियोगिताओ में हिस्सा लेने का बहुत शौक था। कालेज में विभिन कार्यक्रमों में भी हिस्सा लेता रहता था। पढ़ाई भी खूब की। शुरुआत सरकारी कालेज मलेर कोटला से की उस के बाद पंजाबी यूनिवर्सिटी पटियाला और पंजाब यूनिवर्सिटी से पांच एम ए की हुई है। उस के बाद जय हिन्द कॉलेज मुंबई चला गया। यासीन मालिक जो की मलेरकोटला के ही रहने वाले थे। मुंबई फिल्म इंडस्ट्री में बहुत पहुंच रखते थे। उन्होंने अपने चचरे भाई जो की मुंबई में सेटल थे से मुलाकात करवाई। उन दिनों निर्माता,निर्देशक मोहन कुमार अपनी एक नई फिल्म के लिए नए चेहरे की तलाश में थे। यासीन मालिक और उन के चचेरे भाई ने मोहन कुमार से बात की जो की उन को अच्छी तरह जानते थे। मोहन कुमार ने ऑडिशन लिया। ऑडिशन पास हो गया। इस तरह मोम की गुड़िया फिल्म में बतौर हीरो ले लिया गया। फिल्म के गीत हिट रहे रफ़ी साहब का गीत `रेशमा जवान हो गई',गीतकार आनंद बक्शी साहब ने पहली बार इस फिल्म में गीत गाया। फिल्म के संगीत निर्देशक थे लक्ष्मी कान्त प्यारेलाल थे।
फिल्म इंडस्ट्री से गायब कैसे हो गए। इस के बारे वह बताते है की जब उन की दादी को यह पता चला की मैं फिल्मों में काम कर रहन हूँ तो वह नाराज हो गई और कहने लगी की अगर तू फिल्मों में काम करेगा तो मैं अपने आप को आग लगा लुंगी। घर में खूब हंगामा होता रहता।इसी के चलते फिल्मों से दूरी होने लगी। फिल्म मोम की गुड़िया के बाद उन के पास सात फिल्मे भी आ गई थी। लेकिन दादी और रिश्तेदारों की जिद्द ने उन्हें बॉलिवुड से दूर कर दिया।



