प्रेम कुमार पिछले 50 वर्षों से वॉल पेंटिंग का काम कर रहे हैं फिल्म पाकीज़ा की पहली वाल पेंटिंग की थी

 प्रेम कुमार पिछले 50 वर्षों  से वॉल पेंटिंग का काम कर रहे हैं फिल्म पाकीज़ा की पहली वाल पेंटिंग की थी 


प्रेम कुमार पिछले 50 साल से वॉल पेंटिंग का काम कर रहे हैं फिल्म पाकीज़ा की पहली वाल पेंटिंग की थी


प्रेम कुमार पिछले 50 साल से वॉल पेंटिंग का काम कर रहे हैं एक जमाना होता था जब विज्ञापन के लिए कोई ज्यादा ऑप्शन नहीं होते थे या तो अखबार होता था या फिर रेडियो और फिर उसके बाद सबसे ज्यादा प्रचलित साधन था वॉल पेंटिंग का। हालात यह होते थे कि वॉल पेंटिंग के लिए कंपनियों की मारामारी लगी रहती थी। जगह बुक करवानी पड़ती थी कई जगह तो लोग जहां वॉल पेंटिंग होती थी वहां विज्ञापन दाताओं से अच्छे खासे पैसे भी वसूल कर लेते थे। यहां बात हो रही है वॉल पेंटिंग करने वाले आर्टिस्ट की। 

प्रेम कुमार पिछले 50 साल से वॉल पेंटिंग का काम कर रहे हैं फिल्म पाकीज़ा की पहली वाल पेंटिंग की थी



आज के डिजिटल युग में वॉल पेंटिंग का सारा ही भविष्य खत्म हो चुका है उसको अब फ्लेक्स प्रिंटिंग ने ले लिया है। वॉल पेंटिंग वाले आर्टिस्ट प्रेम कुमार जोकि पानीपत के रहने वाले हैं वह बताते हैं कि 20 वर्ष की आयु में में ही उन्होंने वॉल पेंटिंग का काम शुरू कर दिया था अभी वह 70 को पार कर चुके हैं। गिने-चुने लोग ही वॉल के पेंटिंग का काम कर रहे हैं । वह बताते हैं कि जब तक सांस है तब तक वह इस काम को करते रहेंगे क्योंकि अब इतनी उम्र  हो चुकी है कि और कोई वह काम कर नहीं सकते बस एक इस काम को करने की धुन सवार रहती है। यही वजह है कि आज भी वह दीवारों के ऊपर विज्ञापन लिखते आ रहे हैं। 


प्रेम कुमार बताते हैं कि एक वह भी समय था जब वह फिल्म के विज्ञापन भी दीवारों और सिनेमा घरों के बाहर बनाया करते थे। फिल्मों के विज्ञापन का काम उन्होंने मीना कुमारी की फिल्म पाक़ीज़ा के साथ शुरू किया था उसके बाद और बहुत सी फिल्में आई जिनका वॉल पेंटिंग उन्होंने किया था जिनमें से सबसे ज्यादा जो उन्होंने काम किया था वह फिल्म सुहाग का था। वे बताते हैं कि आज तक 30- 35 वर्ष पहले इस काम के लिए पांच पैसे स्क्यर फिट के हिसाब से पेमेंट मिलती थी अभी यह 50 पैसे के हिसाब से पैसे मिलते हैं। पिछले 35 वर्षों से प्रेम कुमार एक डॉक्टर का विज्ञापन दीवारों पर लिखते आ रहे हैं वह बताते हैं कि यह काम मात्र एक जगह का नहीं होता जहां आप रहते हो। बल्कि कई 100 किलोमीटर तक भी जाकर विज्ञापन दीवारों पर लिखने पड़ते हैं।एक शहर में एक या दो दिन लग जाते है फिर रात भी वही बितानी पड़ती है।  

प्रेम कुमार बताते हैं कि उन्होंने इस क्षेत्र की लगभग सभी राजनीतिक पार्टियों के लिए वॉल पेंटिंग की है और चुनाव के दौरान उनकी काफी डिमांड रहती थी.यह कम ही हुआ है कि किसी ने पेमेंट ना दी हो। एक आध राजनीतिक पार्टी के साथ तजुर्बा कोई अच्छा नहीं रहा, काम भी करवा दिया बाद में हार गए और पूरे का पूरा पैसा डूब गया। इसके अलावा सभी पार्टियों के साथ तजुर्बा बहुत ही अच्छा रहा।  लेकिन अब हालात बदल गए हैं अब वॉल पेंटिंग कोई नहीं करवाता। बस यूं कह लीजिए साहब की दिहाड़ी बन जाती है। जो गुजरा जमाना था वह बहुत याद आता है और वह एक सुनहरी युग था। अब तो परिवार में भी कोई इस काम में नहीं आना चाहता मैं अकेला ही यह काम कर रहा हूं।परिवार में और किसी ने भी यह काम नहीं सीखा। 

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